अकाल तख्त के सामने झुकी AAP! Bhagwant Mann-Arvind Kejriwal को सबसे बड़ा झटका? Sach Ki Raftar
क्या पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार खुद को सिख मर्यादा और परंपराओं से भी ऊपर समझने लगी है? दिल्ली में बैठे अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को क्या लगा था कि वो बिना किसी से सलाह किए, अपनी मर्जी से कानून थोप देंगे और पंजाब की जनता शांत रहेगी? तस्वीरें गवाह हैं दोस्तों! 29 जून को पंजाब में जो हुआ, उसने इतिहास बदल दिया। सरकार के मंत्रियों और विधायकों की अकाल तख्त के सामने परेड हो रही थी, उन्हें लाइन में लगकर पेश होना पड़ा!
ये केजरीवाल और भगवंत मान के अहंकार पर सबसे बड़ा धार्मिक और सामाजिक तमाचा है! अब समझिए कि बात यहां तक कैसे पहुंची। 13 अप्रैल 2026 को बैसाखी के पवित्र मौके पर भगवंत मान सरकार ने विधानसभा में एक नया कानून पास किया—एंटी सैक्रिलेज लॉ यानी बेअदबी विरोधी कानून। सरकार का दावा था कि वो 2015 के बरगाड़ी बेअदबी कांड जैसी घटनाओं को रोकने के लिए 7 से 20 साल तक की जेल और उम्रकैद जैसे कड़े प्रावधान ला रही है।
सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है, लेकिन मान सरकार की नीयत और उनकी कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल तब उठा, जब यह पता चला कि इतने बड़े संवेदनशील धार्मिक कानून को बनाने से पहले केजरीवाल और भगवंत मान की सरकार ने न तो अकाल तख्त साहिब से कोई सलाह ली, न शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) से बात की और न ही सिख विद्वानों को भरोसे में लिया! क्या दिल्ली और चंडीगढ़ के वातानुकूलित कमरों में बैठकर सिखों के सबसे पवित्र ग्रंथ से जुड़े कानून तय किए जाएंगे?”
अकाल तख्त ने इस कानून पर पांच ऐसे बिंदु उठाए हैं जिसने आम आदमी पार्टी सरकार की अज्ञानता और जल्दबाजी को सरेआम बेनकाब कर दिया है! धार्मिक मामलों में सीधा दखल: अकाल तख्त का साफ कहना है कि सरकार अपराध पर कानून बनाए, लेकिन सिख मर्यादा और परंपरा तय करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ अकाल तख्त का है। केजरीवाल और मान इसमें टांग अड़ाने वाले कौन होते हैं? नए कानून में सेवादारों और घर में गुरु ग्रंथ साहिब रखने वालों पर कानूनी जिम्मेदारी थोप दी गई है।
इससे श्रद्धालुओं में डर पैदा होगा और किसी पर भी झूठे केस दर्ज हो सकते हैं। सरकार ने कानून में ‘स्वरूप’ शब्द का इस्तेमाल किया, जबकि धार्मिक मर्यादा के हिसाब से वहां ‘वीर’ शब्द होना चाहिए था। यह दिखाता है कि इस सरकार को सिख इतिहास और शब्दावली की बुनियादी समझ तक नहीं है! इसके अलावा, क्षतिग्रस्त स्वरूपों के सत्कार को लेकर भी कानून में जो बातें लिखी गईं, वो पूरी तरह से प्रशासनिक नियमों पर आधारित थीं, न कि धार्मिक मर्यादाओं पर।
यानी रिलीजन और क्राइम के बीच की लाइन को इस सरकार ने पूरी तरह धुंधला कर दिया! यह वही आम आदमी पार्टी है जो पंजाब में बदलाव की बातें करती थी, लेकिन आज सत्ता के नशे में चूर होकर यह भूल गई कि पंजाब की सियासत और समाज की रग-रग में अकाल तख्त साहिब बसता है। 1606 में छठे गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब जी द्वारा स्थापित अकाल तख्त सिखों की वो सर्वोच्च संस्था है, जिसके सामने बड़े-बड़े राजा-महाराजा और पटियाला के शासक आला सिंह तक नतमस्तक हुए हैं।
2024 में सुखबीर सिंह बादल को भी वहां सजा भुगतनी पड़ी थी। तो भगवंत मान जी, आप और आपके आका अरविंद केजरीवाल खुद को कानून से ऊपर कैसे समझ सकते हैं? बिना धार्मिक संस्थाओं को विश्वास में लिए कानून बनाना सिर्फ एक राजनीतिक स्टंट और पब्लिसिटी बटोरने की कोशिश थी, जिसका नतीजा आज यह हुआ कि आपके विधायकों को अकाल तख्त के सामने पेश होना पड़ रहा है! इस पूरी घटना ने साबित कर दिया है कि राजनीति चाहे कितनी भी बड़ी हो जाए,
आस्था और धार्मिक मर्यादा के ऊपर कभी नहीं हो सकती। क्या आपको भी लगता है कि अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने यह कानून सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए और जल्दबाजी में बनाया? क्या अकाल तख्त के सामने सरकार की यह पेशी सही संदेश देती है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर ठोकिए, इस वीडियो को हर पंजाबी और हर देशवासी तक शेयर करके पहुंचाइए और चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल मत भूलिए। जय हिंद, वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह!”
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