क्या सिर्फ सत्ता के लिए बनी है TMC? हारते ही बिखरा Mamata Benarjee का किला | Sach Ki Raftar
आज बात पश्चिम बंगाल की और उस राजनीतिक पाखंड की, जिसका पर्दाफाश खुद टीएमसी के अंदर से हो चुका है। लोकतंत्र में हार-जीत चलती रहती है, लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब सत्ता हाथ से जाती है। जैसे ही बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता पर आंच आई, इनका पूरा का पूरा किला ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा है! जो नेता 40-50 साल तक ममता बनर्जी की परछाई बने रहे, आज वही टीएमसी के भ्रष्टाचार और तानाशाही पर सरेआम थूक रहे हैं।
आज सवाल यह है कि क्या टीएमसी सिर्फ मलाई खाने के लिए बनी थी? क्या अपोजिशन में बैठने की इस पार्टी की औकात ही नहीं है? सोचिए, चार बार की सांसद और ममता बनर्जी की सबसे करीबी सिपहसालार काकोली घोष दस्तीदार ने चुनाव हारते ही सांगठनिक पदों से इस्तीफा दे दिया। लेकिन बात सिर्फ इस्तीफे की नहीं है। उन्होंने ममता बनर्जी के मुंह पर वो कड़वा सच बोला है, जिसे सुनकर पूरी टीएमसी का ढांचा हिल गया है।
काकोली घोष ने साफ कहा कि पार्टी में भ्रष्टाचार चरम पर है, ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) नाम की कोई चीज नहीं बची है और पार्टी अपने पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं को भूल चुकी है। मैडम काकोली घोष! जब तक आपकी पार्टी बंगाल को लूट रही थी, जब तक आप सत्ता की मलाई चाट रही थीं, तब तक आपको ये भ्रष्टाचार क्यों नहीं दिखा? तब आपकी जुबान पर ताला क्यों लगा था? क्या भ्रष्टाचार सिर्फ हारने के बाद ही नजर आता है?
यह साफ तौर पर दिखाता है कि टीएमसी के अंदर कोई विचारधारा नहीं, सिर्फ और खुदगर्जी और सत्ता का लालच भरा है! काकोली घोष ने ‘आईपैक’ (I-PAC) जैसी इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनियों पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि ये बाहरी एजेंसियां ग्राउंड वर्कर्स पर दबाव डालती हैं और पार्टी को जनता से काट देती हैं। यह है ममता बनर्जी का तथाकथित ‘मा-माटी-मानुष’ का मॉडल! जो पार्टी कभी जमीन से उठने का दावा करती थी, आज वो भाड़े के कॉरपोरेट लड़कों के भरोसे चुनाव लड़ रही है। जब तक ये कंपनियां जिताती रहीं, तब तक सब ठीक था। जैसे ही जनता ने लात मारी, वैसे ही एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ना शुरू हो गया। कोई ममता को कोस रहा है, कोई अभिषेक बनर्जी को, तो कोई आईपैक को। इसे कहते हैं- ‘सिर्फ जीतने के लिए बनी पार्टी का असली चरित्र’। अब जरा इस चूहा-दौड़ की तुलना देश के महान स्टेट्समैन अटल बिहारी वाजपेयी जी से कीजिए। आज लोग बीजेपी को एक बड़ी ताकत के रूप में देखते हैं, लेकिन वाजपेयी जी ने दशकों तक विपक्ष के अंधकार में समय बिताया।
1996 में उनकी सरकार सिर्फ 13 दिन चली, लेकिन वो टूटे नहीं, न ही उनके कार्यकर्ताओं ने अपनी पार्टी पर सवाल उठाए। क्योंकि वहां विचारधारा थी, प्रिंसिपल्स थे। स्मृति ईरानी: 2014 में अमेठी जैसे कांग्रेस के गढ़ से राहुल गांधी से हार गईं। लेकिन वो दिल्ली के महलों में नहीं बैठीं, वो अमेठी की धूल में डटी रहीं और 2019 में इतिहास रच दिया। संबित पात्रा: 2019 में पुरी से मामूली अंतर से हारे, टीवी डिबेट्स कम कीं, जमीन पर पसीना बहाया और 2024 में 1 लाख से ज्यादा वोटों से जीतकर आए।
बीसी खंदूरी: उत्तराखंड के इतने बड़े नेता, मुख्यमंत्री रहते हुए 2012 में कोटद्वार से चुनाव हार गए, लेकिन उन्होंने जनता का साथ नहीं छोड़ा। ये होता है नेताओं का चरित्र! जो हारने के बाद भी जनता के बीच खड़े रहते हैं। लेकिन ममता बनर्जी की टीएमसी का हाल देखिए। सत्ता जाते ही इनके नेता विक्टिम कार्ड खेलने लगे हैं। नेताओं का कॉन्फिडेंस अब पर्सनल फ्रस्ट्रेशन और शिकायतों में बदल चुका है। लोकतंत्र का सबसे बड़ा टेस्ट यही होता है कि जब आपके पास पावर न हो, तब आपके पास सिद्धांत बचते हैं या नहीं। टीएमसी इस टेस्ट में पूरी तरह फेल हो चुकी है। सत्ता गई, तो इनका कथित अनुशासन भी हवा हो गया। अब आप लोग मुझे कमेंट बॉक्स में बताइए—क्या ऐसी अवसरवादी पार्टी, जो सिर्फ सत्ता के लिए साथ थी, कभी बंगाल की जनता का भला कर सकती थी? क्या ममता बनर्जी का ये पतन निश्चित था? वीडियो को दबाकर लाइक, शेयर और चैनल को सब्सक्राइब जरूर ठोकिए। जय हिंद, वंदे मातरम!
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