जज को हटाने की चाल Fail, Kejriwal की ‘कोर्ट पॉलिटिक्स’ पर पड़ा भारी फैसला | Justice Swarana Kanta Sharma | Sach Ki Raftar
क्या आपने कभी सुना है कि कोई आरोपी खुद तय करे कि उसका जज कौन होगा? या फिर कोई राजनेता अदालत में खड़े होकर जज से ही कहे कि ‘आप हट जाइए, मुझे आप पर भरोसा नहीं है’? दिल्ली की राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसा ही ‘सिनेमैटिक ड्रामा’ देखने को मिल रहा है जो आज तक हिंदुस्तान के इतिहास में कभी नहीं हुआ । अरविंद केजरीवाल, जो खुद को संविधान का रक्षक बताते हैं, उन्होंने देश की न्यायपालिका के साथ एक ऐसी ‘Catch-22’ सिचुएशन पैदा करने की कोशिश की,
जिसे सुनकर कानून के जानकार भी हैरान हैं। लेकिन इस बार उनका सामना था जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से, जिन्होंने अपने 1 घंटे के ऐतिहासिक फैसले में केजरीवाल की इस ‘ट्रैप पॉलिटिक्स’ की धज्जियाँ उड़ा दीं।” “पूरा मामला समझिए। शराब घोटाला मामले में जब सीबीआई हाई कोर्ट पहुंची, तो सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच में होनी थी। केजरीवाल ने यहाँ एक शातिर घटिया सोची-समझी रणनीति चली। उन्होंने अर्जी दी कि जस्टिस शर्मा इस केस से हट जाएं।
तर्क क्या था? तर्क ये कि जज साहिबा एक बार RSS से जुड़े संगठन ‘अधिवक्ता परिषद’ के कार्यक्रम में गई थीं। दूसरा बेतुका और घटिया तर्क ये कि उनके बच्चे केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं। अब आप खुद सोचिये की केजरीवाल कितनी घटिया स्तर की राजनीती पर उतर आये है जिसमे वो एक न्यायधीश के बच्चो तक को कोर्ट में ले आये। सोचिए, एक मुख्यमंत्री स्तर का व्यक्ति जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाने के लिए उनके परिवार और उनके निजी जीवन के कार्यक्रमों को ढाल बना रहा है।
क्या ये न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं थी?” “जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने इस पर जो कहा, वो भारतीय न्यायिक इतिहास में याद रखा जाएगा। उन्होंने लगभग 1 घंटे तक अपना फैसला सुनाया और कोर्ट रूम में सन्नाटा पसर गया। जज ने कहा कि उनकी चुप्पी को कमजोरी न समझा जाए। उनकी जिम्मेदारी संविधान के प्रति है, किसी राजनेता की शंकाओं के प्रति नहीं। उन्होंने कड़े शब्दों में पूछा कि एक जज को बार-बार अपनी ईमानदारी की ‘अग्निपरीक्षा’ क्यों देनी पड़ती है?
सिर्फ इसलिए क्योंकि एक रसूखदार नेता को अपनी सुविधा का फैसला चाहिए? जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने साफ किया कि उनके बच्चे अपने दम पर वकील बने हैं और जिस केस में केजरीवाल आरोपी हैं, उसमें उनके बच्चे कहीं भी शामिल नहीं हैं। क्या जज के बच्चे वकील नहीं बन सकते? क्या ये उस मां और जज के करियर पर निजी हमला नहीं था?” “अदालत ने केजरीवाल की उस चालाकी को भी पकड़ा जिसे वो ‘मास्टरस्ट्रोक’ समझ रहे थे।
जज ने कहा कि केजरीवाल ने एक ऐसी स्थिति पैदा की जहाँ: अगर जज हट जातीं, तो केजरीवाल कहते- ‘देखा, मेरी बात सच थी, जज निष्पक्ष नहीं थीं।’ अगर जज नहीं हटतीं, तो वो भविष्य में फैसले पर सवाल उठा सकते थे कि ‘हमने तो पहले ही कहा था कि हमें न्याय नहीं मिलेगा।’ और अगर केजरीवाल का इतिहास उठा कर देखा जाये तो वो ऐसी स्थिति पहले भी बना चुके है। इसे कहते हैं ‘न्यायिक ब्लैकमेलिंग’। लेकिन जस्टिस शर्मा ने साफ कह दिया कि ‘मैं पीछे नहीं हटूंगी।’
उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर आज वो झुक गईं, तो कल हर अपराधी अपनी पसंद का जज चुनने की जिद करेगा और पूरा जुडिशियल सिस्टम ढह जाएगा।” “यहाँ सवाल ये उठता है कि केजरीवाल खुद को कानून से ऊपर क्यों समझते हैं? जब सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलती है, तो न्यायपालिका महान हो जाती है। लेकिन जब हाई कोर्ट तथ्यों पर बात करता है, तो जज की विचारधारा पर सवाल उठाए जाने लगते हैं।
केजरीवाल ने खुद कोर्ट में पेश होकर माहौल बनाने की कोशिश की, वीडियो सर्कुलेट करवाए, ताकि जनता के बीच एक ‘धारणा’ (Perception) बनाई जा सके। लेकिन अदालतें धारणाओं पर नहीं, बल्कि सबूतों और कानून पर चलती हैं। जस्टिस शर्मा ने सही कहा कि ‘जज का पद इतना हल्का नहीं होता कि कोई भी आकर उसे हिला दे’।” “दोस्तों, ये मामला सिर्फ केजरीवाल बनाम सीबीआई नहीं है। ये मामला है ‘संस्थान बनाम रसूख’ का।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का ये फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा सबक है जो सोचते हैं कि वो सोशल मीडिया और राजनीतिक रैलियों के जरिए कोर्ट के फैसलों को मैनेज कर सकते हैं।
आपका इस पूरे मामले पर क्या सोचना है? क्या केजरीवाल ने जज पर सवाल उठाकर मर्यादा लांघी है? कमेंट्स में अपनी राय जरूर दें और इस निष्पक्ष पत्रकारिता को सपोर्ट करने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करें। धन्यवाद!”
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