जौहर कायरता है? स्वरा का ‘जौहर’ पर फिर ज़हर! वीरांगनाओं का घोर अपमान! हलाला पर चुपी क्यों? Sach Ki Raftar
जब-जब भारतीय इतिहास, स्वाभिमान और हमारी वीरांगनाओं के बलिदान की बात आती है, तब-तब कुछ तथाकथित ‘लिबरल्स’ और फेल्ड एक्टर्स अटेंशन पाने के लिए बिलों से बाहर आ जाते हैं! 2 मिनट की सस्ती पब्लिसिटी और मीडिया लाइमलाइट बटोरने के लिए एक बार फिर हलाला भास्कर हम्म शमा करे स्वरा भास्कर ने हमारे गौरवशाली इतिहास और वीरांगनाओं के सर्वोच्च बलिदान पर ज़हर उगलना शुरू कर दिया है!”
खातून स्वरा भास्कर का कहना है कि जौहर दिखाना कायरता है और इससे बलात्कार पीड़िताओं को गलत संदेश मिलता है! उनका 2018 का वो बयान याद कीजिए, जिसमें उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि फिल्म देखने के बाद उन्हें ‘रिड्यूस्ड टू ए वजाइना’ महसूस हुआ!
सवाल गंभीर होने का भ्रम पैदा करता है, लेकिन असली सवाल स्वरा भास्कर की सोच और नीयत पर उठता है—क्या 13वीं सदी के आक्रांताओं के अत्याचार से अपने स्वाभिमान को बचाने वाली वीरांगनाओं के बलिदान को आज कायरता कह देना उन वीरांगनाओ का घोर अपमान है जिन्होंने अपने आत्सम्मान के लिए मौत को गले लगाया पर एक गैर धर्म की पुरुष को अपनी परछाई तक छूने नहीं दी पर शायद ये बात स्वरा को समझ नहीं आएगी क्यों खुद दिने रात एक गैर धर्म के व्यक्ति की कनीज बन कर जी रही हो।
स्वरा जी कहती हैं कि ‘महिलाओं को जीने का अधिकार है, चाहे परिस्थिति कोई भी हो।’ लेकिन स्वरा जी इस बात की गारंटी दे सकती हैं क्या कि 13वीं सदी के इस्लामी आक्रांताओं की कैद में जाने के बाद उन महिलाओं का यौन शोषण नहीं होता? उन्हें सेक्स स्लेव बनाकर नहीं रखा जाता?
आक्रांताओं की बर्बरता पर चुप्पियाँ साधना और अपनी गरिमा की रक्षा के लिए जलती चिता में कूदने वाली वीरांगनाओं को ‘कायर’ कह देना—यह किस प्रकार का फेमिनिज्म है?”
जौहर कोई आज का ‘जेंडर नैरेटिव’ या सुसाइड नहीं था! यह मध्यकालीन भारत में विदेशी आक्रांताओं के जुल्म, कैप्टिविटी और हवस से अपनी पवित्रता, चरित्र और राजधर्म को बचाने का अंतिम और साहसी कदम था और ये पवित्रता उनको नहीं समझ आती जो भरे मंच पर ऐसे कपडे पहनकर बैठती है जो छुपाते कम और दिखते ज्यादा है वैसे भी चरित्र शब्द खातून स्वरा भास्कर की डिक्सनरी में नहीं है। और बात धर्म की तो जो खुद अपने धर्म को ठोकर मारकर दूसरे धर्म को अपना ले उससे आप क्या ही धर्म की बात करोगे।
जब युद्ध के मैदान में राज्य के सभी पुरुष वीरगति को प्राप्त हो जाते थे, तब इन वीरांगनाओं के सामने दो ही रास्ते थे—या तो आक्रांताओं की गुलाम बनकर घुट-घुट कर रोज़ मरना, या फिर अपनी मर्जी से आत्मसम्मान के लिए आग के सुपुर्द हो जाना। और उन वीरांगनाओं ने आत्मसम्मान का रास्ता चुना।
स्वरा भास्कर जैसे लोगों का फ्रेमवर्क यह मानता है कि जौहर सिर्फ पेट्रियार्की का दबाव था। लेकिन सच यह है कि उन्होंने शत्रु के सामने झुकने के बजाय अपनी Agency अपने हाथों में रखी। किसी घेराबंदी की स्थिति में अपने चरित्र और स्वाभिमान को चुनने वाली नारियों को 21वीं सदी के एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर ‘कायर’ घोषित कर देना घटिया राजनीति और ऐतिहासिक अज्ञानता की पराकाष्ठा है!”
बात जब हिंदू संस्कृति, इतिहास या स्वाभिमान की आती है, तो स्वरा भास्कर का ‘सिलेक्टिव आउटरेज’ तुरंत जाग जाता है। लेकिन जब आक्रांताओं की बर्बरता, हलाला या महिलाओं पर होने वाले अन्य धार्मिक अत्याचारों की बात आती है, तब यह गैंग मौन धारण कर लेता है! आज स्वरा भास्कर हलाला तीन तलाक और इस्लाम में महिलाओ के ऊपर होने वाले अत्याचार पर क्यों नहीं बोलती है जानते है क्यों क्युकी फिर इनका भी हलाला हो जायेगा।
अगर सिनेमा में किसी फिक्शनल कहानी या टॉक्सिक लव स्टोरी को ‘क्रेज़ी लव’ कहकर डिफेंड किया जा सकता है, तो जब इतिहास के सबसे बड़े बलिदान को पर्दे पर दिखाया जाता है, तब इनके पेट में दर्द क्यों होने लगता है?
किसी ऐतिहासिक घटना को देखकर सीधे यह निष्कर्ष निकाल देना कि यह आज की पीड़िताओं को मरने का संदेश दे रहा है—यह इतिहास को समझने का प्रयास नहीं, बल्कि अपनी वामपंथी विचारधारा के हिसाब से इतिहास को विकृत करने की कोशिश है!”
जैसे ही खातून स्वरा भास्कर का बयान से लोग भड़कने लगे तो मोहतरमा माफ़ी मांग रही है कह रही है मने ऐसा कुछ नहीं कहा मेरे बयान को गलत तरीके से दिखा गया है जबकि वीडियो गवाह है की उन्होंने क्या कहा।
इतिहास पर बहस बिल्कुल हो सकती है, लेकिन बहस में तर्क और तथ्य होने चाहिए—अवांछित गुस्सा और देश के गौरवशाली अतीत को नीचा दिखाने की मानसिकता केवल देश में रह रहे आक्रांताओं की ही हो सकती है
स्वरा भास्कर ने वीरांगनाओं के बलिदान को कटघरे में खड़ा करके खुद को जनता की अदालत में खड़ा कर लिया है। अब देश की जनता का पूरा अधिकार है कि वह स्वरा भास्कर जैसे लोगों के इस खोखले नैरेटिव की बखिया उधेड़े।
आपकी इस पूरे मुद्दे पर क्या राय है? क्या जौहर को ‘कायरता’ कहना इतिहास का अपमान है या नहीं? कमेंट सेक्शन में अपनी बेबाक राय ज़रूर दें। वीडियो को ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें ताकि हमारी वीरांगनाओं के बलिदान का सच हर घर तक पहुँचे। जय हिंद, जय भारत!”
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