तुष्टीकरण का खेल खत्म!! नहीं चलेगी अब धर्म की राजनीती! ममता की हार, कानून की जीत | Sach Ki Raftar

तुष्टीकरण का खेल खत्म!! नहीं चलेगी अब धर्म की राजनीती! ममता की हार, कानून की जीत | Sach Ki Raftar

आज बात होगी उस राज्य की, जिसे दशकों तक वोट बैंक की राजनीति की भट्टी में झोंका गया। आज बात होगी उस तुष्टीकरण की, जिसके आगे देश की सेना तक को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया गया। अपनी स्क्रीन पर देखिए… ये दो तस्वीरें कोई मामूली तस्वीरें नहीं हैं। ये तस्वीरें कहानी बयां करती हैं ‘अहंकार’ और ‘अधिकार’ के बीच के अंतर की!
बाईं तरफ जो आप देख रहे हैं, वो है साल 2025 का बंगाल। कोलकाता का मशहूर रेड रोड एरिया, जहाँ आम जनता की गाड़ियों के पहिए थम जाते थे, पूरी सड़क ब्लॉक कर दी जाती थी, ताकि एक विशेष समुदाय को खुश किया जा सके। और इस तमाशे में घी डालने कौन पहुँचती थीं? खुद सूबे की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी! क्यों? क्योंकि सामने वोट बैंक जो चमक रहा था!
अब जरा अपनी स्क्रीन की दाईं तरफ नजर घुमाइए। तारीख नोट कर लीजिए—28 मई 2026! ये है नया बंगाल, बदला हुआ बंगाल! वही रेड रोड एरिया है, लेकिन मजाल है कि कोई एक गाड़ी भी रुक जाए? कोई ट्रैफिक जाम नहीं, कोई सड़क ब्लॉक नहीं!
तो क्या नमाज़ नहीं हुई? नमाज़ बिल्कुल हुई, लेकिन सड़क पर जनता को बंधक बनाकर नहीं, बल्कि सम्मान के साथ ब्रिगेड परेड ग्राउंड पर! बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी ड्रामे के। इसे कहते हैं कानून का राज और इसी को कहते हैं असली सुशासन
लेकिन दोस्तों, यहाँ ठहरिए और सोचिए… जो काम आज इतनी शांति से, इतने बेहतर मैनेजमेंट के साथ हो गया, वो काम पहले क्यों नहीं होता था? आखिर क्यों टीएमसी की सरकार ने बंगाल को अपनी जागीर समझ रखा था?
आपको एक कड़वा सच बताता हूँ, जो शायद ममता बनर्जी कभी नहीं चाहेंगी कि आप जानें। यह रेड रोड कोई आम नगर निगम की सड़क नहीं है, यह इंडियन आर्मी (भारतीय सेना) की प्रॉपर्टी है!
आपको याद होगा, पिछले साल जब देश की सुरक्षा के लिए, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत हमारी सेना को वहाँ सैन्य प्रशिक्षण (Military Training) करना था, तब सेना ने सुरक्षा कारणों से यहाँ कार्यक्रम की अनुमति देने से मना कर दिया था। लेकिन टीएमसी की सरकार ने क्या किया?
ममता बनर्जी खुद मैदान में उतर आईं! सेना पर दबाव बनाया गया, हस्तक्षेप किया गया। नतीजा क्या हुआ? देश की सुरक्षा के लिए मुस्तैद सेना को अपनी ट्रेनिंग शिफ्ट करनी पड़ी, ताकि सड़क पर नमाज़ का वीआईपी इंतजाम किया जा सके!
सोचिए… एक राज्य की मुख्यमंत्री के लिए देश की सेना की ट्रेनिंग से ज्यादा जरूरी सड़क पर ट्रैफिक रोकना था! क्यों भाई? क्या कोलकाता में और कोई जगह नहीं थी? क्या मस्जिदों में जगह कम पड़ गई थी? जगह थी, विकल्प भी थे, लेकिन नीयत साफ नहीं थी। क्योंकि जब तक जनता परेशान नहीं होगी, तब तक राजनीति की रोटियां कैसे सेकेंगी?
यह बीमारी सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं थी। जरा दूसरे राज्यों का हाल भी देख लीजिए। आम आदमी पार्टी के राज में लुधियाना की सड़कों की तस्वीरें देखिए—सड़कें जाम, जनता परेशान। तेलंगाना की एक कॉलोनी का हाल देख लीजिए—सड़क पर खून की लहरें तैर रही हैं। क्या यही है आपका सेक्युलरिज्म? क्या जनता को परेशान करना ही धर्म का हिस्सा है?
अब इसके उलट जरा उत्तर प्रदेश के आगरा की तस्वीरें देखिए, जहाँ ताजमहल के परिसर में शांति से नमाज़ अदा की गई। और आज के बंगाल को देखिए, जहाँ शुभेंदु अधिकारी की सरकार आते ही तुष्टीकरण का यह पूरा का पूरा सिंडिकेट ध्वस्त हो गया!
हैरानी की बात देखिए, खुद मुस्लिम समुदाय के लोग आज इस व्यवस्था से माशाल्लाह बेहद खुश हैं! वो कह रहे हैं कि ‘शुक्रगुजार हैं हम इस हुकूमत के, जिसने बिना किसी भेदभाव के पार्किंग से लेकर आने-जाने का इतना शानदार रास्ता दिया।’ यानी नमाज़ पढ़ने वालों को भी दिक्कत नहीं हुई, और रोज़मर्रा दफ्तर जाने वाली आम जनता को भी कोई परेशानी नहीं हुई। तो फिर ममता बनर्जी को किस बात का डर था? वो किसे बेवकूफ बना रही थीं? साफ है—टीएमसी ने सिर्फ और सिर्फ नफरत और विभाजन की राजनीति की। उन्होंने जनता के मन में यह डर बैठाया कि अगर सड़क ब्लॉक नहीं होगी, तो धर्म खतरे में आ जाएगा। लेकिन आज बंगाल की राष्ट्रभक्त सरकार ने साबित कर दिया कि नियम सबके लिए बराबर होते हैं।
किसी के त्योहार पर कोई रोक नहीं है, लेकिन आपके त्योहार की वजह से देश की सेना या आम जनता की जिंदगी बंधक नहीं बनाई जा सकती।
अब फैसला देश की जनता को करना है। आपको क्या चाहिए? तुष्टीकरण का वो ‘टीएमसी मॉडल’ जिसने सेना तक को नहीं बख्शा, या फिर अनुशासन का यह ‘गवर्नेंस मॉडल’ जिसने बिना किसी हंगामे के सबको अधिकार भी दिया और सम्मान भी? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए। वीडियो को शेयर कीजिए ताकि सच हर घर तक पहुँचे। देखते रहिए… नमस्कार।

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