दिल्ली के “मौत के होटल” और बिक चुका सिस्टम, कौन है 21 मौतों का जिम्मेदार ? Sach Ki Raftar
राजधानी दिल्ली का मालवीय नगर… चारों तरफ धुआं, चीख-पुकार और अपनों को बचाने की जद्दोजहद। कल जो मालवीय नगर के होटल में हुआ, वो कोई हादसा नहीं था… वो दिल्ली के भ्रष्ट सिस्टम द्वारा किया गया एक ‘संस्थागत मर्डर’ था! कागजों पर होटल खोलने के नियम इतने सख्त हैं कि एक आम इंसान चक्कर काटते-काटते थक जाए, लेकिन जब जेबें गर्म हों, तो दिल्ली की संकरी गलियों में भी मौत के ये आलीशान सराय धड़ल्ले से खड़े हो जाते हैं।”
होटल खोलने के लिए नियम क्या कहते हैं? सरकारी कानून के मुताबिक, दिल्ली में होटल खोलने के लिए सड़क की एक तय चौड़ाई होनी चाहिए जो की कम से कम 9 मीटर की होनी ही चाहिए ताकि इमरजेंसी में फायर ब्रिगेड की गाड़ी अंदर घुस सके। बिल्डिंग का नक्शा पास होना चाहिए, MCD से हेल्थ ट्रेड लाइसेंस चाहिए, फ़ूड डिपार्टमेंट यानी FSSAI का लाइसेंस होना चिहिए। दिल्ली पुलिस से लॉजिंग लाइसेंस चाहिए, और सबसे जरूरी—दिल्ली फायर सर्विस (DFS) की फायर NOC होनी चाहिए!
लेकिन जमीनी हकीकत क्या है? आज दिल्ली के पहाड़गंज, करोल बाग, लक्ष्मी नगर और इसी मालवीय नगर की तंग गलियों में झांक कर देखिए… जहाँ दो गाड़ियां एक साथ नहीं गुजर सकतीं, वहाँ चार-चार मंजिला अवैध होटल फल-फूल रहे हैं। कैसे? क्योंकि इन होटलों की नींव ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि रिश्वत की मलाई से रखी जाती है!” “कानूनन, हर इलाके के लोकल पुलिस ऑफिसर और बीट स्टाफ की यह परमानेंट ड्यूटी होती है कि वो अपने इलाके के होटलों की समय-समय पर चेकिंग करें।
होटल में क्या गतिविधियां चल रही हैं, रजिस्टर में एंट्री सही है या नहीं, कोई संदिग्ध तो नहीं ठहरा… यह सब देखना पुलिस का काम है। लेकिन जब इन अवैध होटलों से ‘महीने का बंधी-बंधाई मोटी रकम’ थानों तक पहुँचती है, तो खाकी की आंखें बंद हो जाती हैं। पुलिस को अपने इलाके में चल रही अवैध गतिविधियों की भनक तक नहीं लगती… या यूं कहें कि वो लगना ही नहीं देना चाहते! और बात सिर्फ पुलिस की नहीं है, इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी है MCD यानी नगर निगम!
जिस MCD का काम है कि गली में एक अवैध ईंट भी रखी जाए तो उस पर हथौड़ा चला दे, उसी MCD की नाक के नीचे पूरी की पूरी अवैध गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो जाती हैं। मास्टर प्लान के नियमों को ताक पर रखकर, बिना नक्शा पास कराए ये होटल अवैध रूप से बन भी जाते हैं और सज-धज कर शुरू भी हो जाते हैं। जानते है क्यों? क्योंकि होटल मालिक अच्छी तरह जानते हैं कि ‘महीने का हिस्सा’ अगर सही जगह पहुँच गया, तो सरकारी फाइलें खुद-ब-खुद ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।
अफसरों की तिजोरियां भरती हैं और जनता के हिस्से आती है सिर्फ ‘आग और मौत’! “मालवीय नगर का यह अग्निकांड आखिरी नहीं है। जब तक नियमों को ताक पर रखकर, चंद रुपयों की खातिर मासूमों की जिंदगी का सौदा होता रहेगा, तब तक दिल्ली के ये अवैध होटल ‘मौत के चेंबर’ बने रहेंगे। आज सवाल दिल्ली पुलिस से है, सवाल MCD से है, और सवाल दिल्ली सरकार के उन तमाम महकमों से है—कि आखिर कितने और हादसों के बाद आपकी ये कुंभकर्णी नींद टूटेगी?
आखिर कब तक रिश्वत की मोटी कमाई के आगे इंसानी जिंदगी यूँ ही दम तोड़ती रहेगी?” “अगर आप भी अपने इलाके में ऐसे अवैध और खतरनाक होटलों को देख रहे हैं, तो आवाज उठाइए। क्योंकि आज मालवीय नगर की बारी थी, कल आपकी भी हो सकती है। वीडियो को शेयर कीजिए और सोए हुए सिस्टम को जगाने में अपना हिस्सा दीजिए। जय हिंद।”
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