न्यायपालिका का अपमान या सियासी ड्रामा? केजरीवाल के ‘सत्याग्रह’ पर मचा बवाल | Kejriwal VS Justis Suryakanta Sharma | Sach Ki Raftar
राजनीति में जब दलीलें खत्म हो जाती हैं, तो अक्सर सिद्धांतों का सहारा लिया जाता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का हालिया ट्वीट चर्चा में है, जिसमें उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत का बहिष्कार करने का ऐलान किया है। उन्होंने इसे ‘सत्याग्रह’ और ‘अंतरात्मा की आवाज़’ बताया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में व्यक्ति की अंतरात्मा संविधान और न्यायपालिका से ऊपर हो सकती है?”
केजरीवाल ने कहा कि उनकी न्याय की उम्मीद टूट चुकी है। लेकिन कानून के जानकारों का मानना है कि अदालतें भावनाओं से नहीं, बल्कि सबूतों और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) से चलती हैं। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा, जिन्होंने हमेशा कानून की बारीकियों को सर्वोपरि रखा है, उनके खिलाफ इस तरह का सार्वजनिक बयान देना न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाने जैसा है।
मुख्यमंत्री ने गांधी जी के सिद्धांतों का हवाला दिया। मगर इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी ने कभी कानून की प्रक्रिया से भागने की बात नहीं की। उन्होंने हमेशा अदालती कार्यवाही का सामना किया और सजा को गरिमा के साथ स्वीकार किया। न्यायपालिका के दरवाजे पर आकर ‘असहयोग’ करना सत्याग्रह नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना है।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा दिल्ली हाईकोर्ट की एक सम्मानित न्यायाधीश हैं। न्यायपालिका का काम किसी को खुश करना नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा करना है। जब कोई बड़ा पदधारी यह कहता है कि उसे जज से ‘उम्मीद नहीं है’, तो वह सीधे तौर पर उस अनुच्छेद 14 को चुनौती देता है जो कहता है कि ‘कानून के सामने सब बराबर हैं’।
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