बंगाल में ममता राज के महाघोटाले का पर्दाफाश! लक्षीर भंडार ने भरे बांग्लादेशियों के भंडार | Sach Ki Raftar
आज हम बात करेंगे उस राज्य की, जहाँ की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद को ‘माटी और मानुष’ की रक्षक बताती थीं, लेकिन उनके राज में बंगाल की माटी को घुसपैठियों के हवाले कर दिया गया और देश के ईमानदार टैक्सपेयर्स के पैसे को वोट बैंक की राजनीति की भट्टी में झोंक दिया गया।
कहते हैं न कि पाप का घड़ा जब भर जाता है, तो वो फूटता जरूर है। पश्चिम बंगाल में सरकार बदलते ही ममता बनर्जी के काले कारनामों और घोटालों की फाइलें एक-एक कर खुलने लगी हैं। 27 मई 2026 को पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एक ऐसा खौफनाक खुलासा किया है, जिसने देश की सुरक्षा और सिस्टम दोनों को हिलाकर रख दिया है। ममता बनर्जी की सबसे चर्चित ‘लक्षीर भंडार’ (लक्ष्मी भंडार) योजना में करीब 30 लाख फर्जी और अयोग्य लाभार्थी पाए गए हैं!
आइए इस महाघोटाले के गणित को विस्तार से समझते हैं। साल 2021 में ममता बनर्जी ने आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को हर महीने वित्तीय सहायता देने के नाम पर ‘लक्षीर भंडार’ योजना शुरू की थी। सामान्य वर्ग को 1000 रुपये और कुछ श्रेणियों में 10,700 रुपये तक प्रति माह दिए जा रहे थे। इस योजना में करीब 2.2 करोड़ लाभार्थी जुड़े थे और अब तक जनता की गाढ़ी कमाई के 74,000 करोड़ रुपये फूंके जा चुके हैं।
लेकिन जब नई सरकार ने जमीनी स्तर पर वेरिफिकेशन (सत्यापन) कराया, तो जो सच सामने आया वो रोंगटे खड़े करने वाला है। 30 लाख ऐसे नाम मिले जो न तो सरकारी रिकॉर्ड में हैं, न वोटर लिस्ट में और न ही नागरिकता के डेटा से मेल खाते हैं। हद तो यह हो गई कि महिलाओं की इस योजना का पैसा मृत व्यक्तियों, फर्जी पहचान वालों और यहाँ तक कि पुरुषों के खातों में भी ट्रांसफर किया जा रहा था!
अगर औसतन 1200 रुपये प्रति माह के हिसाब से भी जोड़ें, तो हर महीने करीब 36 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम गलत हाथों में जा रही थी। 5 साल के कार्यकाल के दौरान यह घोटाला 2,000 करोड़ से 2,700 करोड़ रुपये के बीच बैठता है। यह वो पैसा था, जो बंगाल की गरीब और हकदार माताओं-बहनों को मिलना चाहिए था, लेकिन ममता सरकार ने इसे कहाँ लुटाया?
अब आते हैं इस कहानी के सबसे खतरनाक पहलू पर। ये 30 लाख फर्जी लोग आखिर थे कौन? विपक्ष और सुरक्षा एजेंसियों का साफ आरोप है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को फर्जी नागरिकता दस्तावेज, राशन कार्ड और पहचान पत्र सौंपकर इस योजना का सीधा लाभ दिया गया।
ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार ने सिर्फ और सिर्फ अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए देश की सुरक्षा को दांव पर लगा दिया। अवैध प्रवासियों को बंगाल में बसाया गया, उन्हें सरकारी खजाने से पाला गया ताकि चुनाव के वक्त वो टीएमसी के पक्ष में ठप्पा लगा सकें। तृणमूल कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राजनीति के चक्कर में इन फर्जी पहचान पत्रों और अवैध घुसपैठ पर अपनी आंखें और कान पूरी तरह बंद कर रखे थे।
ममता बनर्जी का राष्ट्र विरोधी रवैया सिर्फ योजनाओं तक सीमित नहीं था। भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा की बात करें, तो पूर्वोत्तर के राज्यों—असम, त्रिपुरा और मेघालय ने देश की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार के साथ मिलकर बॉर्डर फेंसिंग (बाड़ लगाने) का काम तेजी से पूरा किया। लेकिन पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने इसमें सालों तक रोड़े अटकाए।
2216 किलोमीटर लंबे इस संवेदनशील बॉर्डर पर बीएसएफ (BSF) को जमीन अधिग्रहण करने में जानबूझकर कानूनी और प्रशासनिक अड़चनें दी गईं। मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और उत्तर 24 परगना जैसे सीमावर्ती जिलों को जानबूझकर खुला छोड़ दिया गया ताकि घुसपैठ की नदी बहती रहे।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि देश का सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे भारत की ‘चिकन नेक’ (चिकन की गर्दन) कहा जाता है—जो पूरे पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है—उसे सुरक्षा के लिहाज से बेहद कमजोर और संवेदनशील बना दिया गया था। क्या यह सीधे तौर पर देश के खिलाफ साज़िश नहीं थी?
लेकिन अब बंगाल में तुष्टिकरण का यह तमाशा और नहीं चलेगा। नई सरकार ने साफ कर दिया है कि राज्य में अब ‘डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट’ (पहचान करो, नाम हटाओ और बाहर निकालो) की नीति पर काम होगा। बॉर्डर सुरक्षा: मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने साफ किया है कि बॉर्डर फेंसिंग को मजबूत करने के लिए बीएसएफ को अतिरिक्त जमीन देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
अन्नपूर्णा भंडार: ‘लक्षीर भंडार’ योजना के इस कचरे को साफ करके अब इसे ‘अन्नपूर्णा भंडार’ के रूप में पुनर्गठित किया जा रहा है, जिसमें पात्र महिलाओं को 3000 रुपये प्रति माह मिलेंगे।
सख्त जांच: अगले 90 दिनों तक एक महा-वेरिफिकेशन अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें घर-घर जाकर जांच, पहचान पत्रों का मिलान और रिकॉर्ड्स को खंगाला जाएगा, ताकि हर एक घुसपैठिए और फर्जी लाभार्थी को सिस्टम से लात मारकर बाहर निकाला जा सके।
ममता बनर्जी का यह मॉडल गवर्नेंस नहीं, बल्कि देश के संसाधनों की लूट और राष्ट्रीय सुरक्षा से किया गया अक्षम्य खिलवाड़ था। आने वाले दिनों में जब जांच एजेंसियां इसकी गहराई में जाएंगी, तो कई और चेहरे बेनकाब होंगे। बंगाल की जनता अब जाग चुकी है और इस सिंडिकेट राज का अंत निश्चित है।
इस विषय पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। देश और राज्यों की ऐसी ही बेबाक और खोजी खबरों के लिए ‘द पम्फलेट’ को सब्सक्राइब करना न भूलें। धन्यवाद!
