बादाम खाइए और मेरी फ़ाइल ढूंढिए, Chhattisgarh के सरकारी दफ्तर में अजब-गजब प्रोटेस्ट | Sach Ki Raftar

बादाम खाइए और मेरी फ़ाइल ढूंढिए, Chhattisgarh के सरकारी दफ्तर में अजब-गजब प्रोटेस्ट | Sach Ki Raftar

आज हम और हमारी सरकार कितने भी दावे कर ले मेक इन इंडिया की या डिजिटल इंडिया की परन्तु सचाई इनसे कोसो दूर है।  आज भी हमारे देश में सरकारी बाबू आम जनता के साथ ऑफिस ऑफिस खेलते दिखाई देते है। और मज़े की बात तो ये है की आज भी हमारे सरकारी विभागों में बिना रिस्वत काम करना असंभव है परन्तु  क्या आपने कभी सुना है कि सरकारी दफ्तर में फाइल ढूंढने के लिए रिश्वत नहीं, बल्कि ‘बादाम’ की जरूरत पड़ती है? छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक शख्स ने भ्रष्टाचार और सुस्ती के खिलाफ जो इलाज किया है, उसने पूरे सिस्टम की धज्जियां उड़ा दी हैं!

देखिए कैसे एक आम आदमी ने अधिकारी की टेबल पर बादाम फैलाकर उसकी ‘याददाश्त’ का टेस्ट ले लिया!” “मामला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर का है। नायक हैं तरुण साहू। गुनाह क्या था? बस इतना कि उन्होंने एक साल पहले एक ईडब्ल्यूएस (EWS) फ्लैट खरीदा और उसे अपने नाम ट्रांसफर करवाना चाहा। सारे दस्तावेज जमा थे, सारे नियम पूरे थे, लेकिन एक साल बीत गया और मैडम अधिकारी का एक ही रटा-रटाया जवाब था— ‘फाइल मिल नहीं रही है, ढूंढनी पड़ेगी!'” लगता है मैडम भी ऑफिस ऑफिस सीरियल से बहुत प्रभावित थी। 

“खेर मोहतरमा ने एक-दो महीने का काम एक साल तक खींच लिया ! उपसंपदा अधिकारी पूनम बंजारे ने तरुण को दफ्तर के इतने चक्कर लगवाए कि चप्पलें घिस जाएं। जब बेशर्मी की हद पार हो गई, तो तरुण ने भी ठान लिया कि आज तो इलाज होकर रहेगा। वो दफ्तर पहुंचे, जेब से आधा किलो बादाम का पैकेट निकाला और अधिकारी की टेबल पर बिखेर दिया!” “तरुण ने भरे दफ्तर में दहाड़ते हुए कहा— ‘मैडम, ये लीजिए बादाम खाइए! शायद इसे खाकर आपकी याददाश्त तेज हो जाए और आपको मेरी वो फाइल याद आ जाए जिसे आप साल भर से दबाए बैठी हैं।’ सोचिए, ये कितनी बड़ी विडंबना है!

जिस फाइल को ढूंढने में पूरा विभाग ‘अंधा’ बना रहा, क्या वो फाइल वाकई गायब थी? या फिर फाइल के पन्नों को पलटने के लिए उन ‘गुलाबी नोटों’ की गर्माहट चाहिए थी, जो तरुण ने देने से मना कर दिया होगा ? सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं— ‘बादाम नहीं, पैसे फेंकते तो फाइल 5 मिनट में मिल जाती!'” “हैरानी की बात देखिए, जब ये वीडियो वायरल हुआ तो विभाग के बड़े अधिकारी एल.पी. बंजारे कहते हैं कि उन्हें मामले की जानकारी ही नहीं है! वाह साहब! आपके नाक के नीचे एक साल से आदमी प्रताड़ित हो रहा है और आपको खबर तक नहीं?

ये विभाग है या याददाश्त खो चुके लोगों का कोई आश्रम?” “तरुण साहू का ये कदम सिर्फ एक विरोध नहीं है, बल्कि उस हर सरकारी कर्मचारी के मुंह पर तमाचा है जो ‘फाइल नहीं मिल रही’ का बहाना बनाकर आम जनता का खून चूसते हैं। तरुण को बधाई कि उन्होंने सिस्टम के सामने गिड़गिड़ाने के बजाय उसे आइना दिखाया।

अब देखना ये है कि इन बादामों को खाने के बाद मैडम की याददाश्त वापस आती है या प्रशासन की नींद टूटने के लिए किसी और बड़े धमाके की जरूरत पड़ेगी?

आप क्या सोचते हैं? क्या सरकारी दफ्तरों में अब ‘बादाम’ ले जाना अनिवार्य कर देना चाहिए? अपनी राय कमेंट में बताइए और इस वीडियो को इतना शेयर करिए कि हर उस ‘भुलक्कड़’ अधिकारी तक ये बादाम पहुंच जाएं!” “भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जंग में साथ दें। चैनल को सब्सक्राइब करें। जय हिंद!”

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