भक्ति के नाम पर VIP कल्चर? संत या सिस्टम का नया खेल, प्रेमानंद महाराज और 3 करोड़ की डिफेंडर | Sach Ki Raftar
क्या ‘मोह-माया’ त्यागने का उपदेश सिर्फ साधारण जनता के लिए है? क्या राधा-राधा जपने वाले संत को 3 करोड़ की आलीशान गाड़ी की जरूरत है? हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें प्रेमानंद महाराज एक चमचमाती Land Rover Defender में नजर आ रहे हैं। जैसे ही गाड़ी गुजरी, लोग उस सड़क की धूल को चूमने लगे, लेकिन वहीं इंटरनेट पर एक नई बहस छिड़ गई है। आज हम ‘सच की रफ़्तार’ पर इसी सच की तह तक जाएंगे कि क्या यह भक्ति है या फिर वीआईपी सुख भोगने का एक नया तरीका?
प्रेमानंद जी, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राधा रानी को समर्पित कर दिया, जिनके प्रवचन सुनने के लिए देश-दुनिया से लोग खींचे चले आते हैं। वो अक्सर कहते हैं कि यह संसार, यह पैसा सब मोह-माया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जो व्यक्ति दुनिया को वैराग्य सिखाता है, वो खुद करोड़ों की गाड़ी में क्यों घूम रहा है? भारत की 80% आबादी जिस गाड़ी में बैठने का सिर्फ सपना देखती है, उस ‘डिफेंडर’ में महाराज शान से सवारी करते हैं। तर्क दिया जाता है कि यह किसी भक्त ने दी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या एक संत को ऐसी भेंट स्वीकार करनी चाहिए जो उसकी सादगी पर ही सवाल खड़ा कर दे?
एक और कड़वा सच यह है कि आज महाराज से मिलना किसके लिए आसान है? बड़े-बड़े नेता, अभिनेता और रसूखदार लोग महाराज के पास आराम से बैठते हैं, बातें करते हैं और उपदेश लेते हैं। लेकिन क्या आप जैसा एक साधारण इंसान, जो पूरी रात सड़कों पर जागकर महाराज की एक झलक पाने का इंतजार करता है, उसे कभी उनके साथ बैठकर दो मिनट बात करने का मौका मिलेगा? अक्सर देखा गया है कि जब महाराज निकलते हैं, तो उनके आसपास ‘साधु’ के वेश में रहने वाले बाउंसर आम लोगों को ऐसे दूर धकेलते हैं जैसे वो कोई अपराधी हों।
क्या एक भक्त दूसरे भक्त को इस तरह प्रताड़ित कर सकता है? भक्ति का मार्ग सेवा और शांति का होता है, लेकिन वृंदावन में नजारा कुछ और ही है। जब महाराज रात को परिक्रमा के लिए निकलते हैं, तो उनके साथ गाड़ियों का काफिला, पुलिस के सायरन, ढोल-मजीरे और डीजे का शोर होता है। क्या आपने सोचा है कि उस समय वहां रहने वाले निवासियों, बुजुर्गों और बच्चों की नींद का क्या होता है? इतना ही नहीं, जब एक बार एक सोसाइटी के लोगों ने इस शोर के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो उनके साथ क्या हुआ?
आरोप है कि महाराज के अनुयायियों ने उन लोगों का सामाजिक बहिष्कार (Boycott) कर दिया, जिसके बाद मजबूरन उन्हें माफी मांगनी पड़ी। सवाल यह है कि क्या ईश्वर का भक्त किसी को इतना मजबूर या दुखी कर सकता है? क्या यह भक्ति है या फिर शक्ति का प्रदर्शन? अध्यात्म का अर्थ होता है अहंकार का त्याग। लेकिन जब व्यवस्था ऐसी बन जाए कि आम आदमी को दूर रखा जाए और केवल खास लोगों को तवज्जो दी जाए, तो सवाल उठना लाजमी है।
हमारा उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि उन विरोधाभासों को सामने रखना है जो आज के दौर के ‘संतों’ में दिख रहे हैं।क्या आपको लगता है कि 3 करोड़ की गाड़ी में घूमना और जनता को परेशानी में डालना एक सच्चे संत की निशानी है? या फिर प्रेमानंद जी का मार्ग अब भक्ति से हटकर कुछ और ही हो गया है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया, तो ‘सच की रफ़्तार’ को लाइक और सब्सक्राइब करें।
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