मून लैंडिंग – सच या धोखा? जूते, झंड, और फोटो सबके खोलेंगे राज | Sach Ki Raftar

मून लैंडिंग – सच या धोखा? जूते, झंड, और फोटो सबके खोलेंगे राज | Sach Ki Raftar

“दोस्तों, क्या 1969 की मून लैंडिंग महज़ एक हॉलीवुड फिल्म की शूटिंग थी? आज भी लाखों लोग मानते हैं कि इंसान कभी चाँद पर गया ही नहीं और अगर सच में  गया था तो फिर दुबारा  आजतक क्यों नहीं जा पाया ? आज हम उन सभी वायरल दावों की धज्जियाँ उड़ाएंगे और जानेंगे कि विज्ञान इस बारे में क्या कहता है। चलिए, समय में पीछे चलते हैं!” एक बड़ा दावा अक्सर किया जाता है की : “नील आर्मस्ट्रांग के स्पेससूट के जूते नीचे से सपाट थे, तो चाँद की मिट्टी पर धारियों वाले निशान (Tread marks) कैसे आए?”

अब सच्चाई भी सुनिए : “दोस्तों, यहीं पर लोग अक्सर गलती कर जाते हैं। नील आर्मस्ट्रांग ने यान के अंदर जो सूट पहना था, उसके जूते सपाट थे। लेकिन चाँद की उबड़-खाबड़ ज़मीन पर चलने के लिए उन्होंने उसके ऊपर से ‘लूनर ओवरबूट्स’ (Lunar Overboots) पहने थे। इन जूतों के तलवे खास तौर पर ग्रिप बनाने के लिए धारियों वाले बनाए गए थे। लैंडिंग के बाद वजन कम करने के लिए इन जूतों को चाँद पर ही छोड़ दिया गया था, जो आज भी वहाँ मौजूद हैं।”

अब सुनिए एक दूसरा सबसे चर्चित दावा की  “चाँद पर हवा नहीं है, फिर भी वीडियो में झंडा हिलता हुआ क्यों दिख रहा है?” और अगर इस बात को सच मान भी लिया जाए तो ये सोचने की बात तो है।  खेर इसके पीछे की भी सच्चाई सुन लीजिये : “अगर आप गौर से देखें, तो झंडे के ऊपर एक क्षैतिज रॉड (Horizontal Rod) लगाई गई थी ताकि वह सीधा दिखे। झंडा तब हिलता है जब अंतरिक्ष यात्री उसे ज़मीन में गाड़ने के लिए ज़ोर लगाते हैं। पृथ्वी पर हवा का घर्षण (Air Friction) हलचल को रोक देता है, लेकिन चाँद पर वैक्यूम है।

वहां एक बार कपड़ा हिलने पर उसे रोकने के लिए कोई हवा नहीं थी, इसलिए वह काफी देर तक ‘इनर्टिया’ के कारण हिलता रहा।”

अब सुनिए दुनिया के  महान ज्ञाताओं का तीसरा दावा की “चाँद की तस्वीरों में आसमान बिल्कुल काला है, एक भी तारा क्यों नहीं दिखाई दे रहा?”  अब इसके पीछे का रहस्य  भी जान लीजिये : “दरसल में यह कोई साजिश नहीं, बल्कि कैमरे का ‘एक्सपोज़र’ (Exposure) है। चाँद पर उस समय दिन था और सूरज की रोशनी बहुत तेज़ थी।

 अंतरिक्ष यात्रियों के सफेद सूट और चाँद की मिट्टी बहुत चमकदार थे। अगर कैमरा सितारों (जो बहुत धुंधले होते हैं) को कैद करने की कोशिश करता, तो पूरी फोटो इतनी ब्राइट हो जाती कि आपको कुछ भी नज़र नहीं आता। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप रात में किसी तेज़ रोशनी वाले लैंप के नीचे खड़े होकर अपनी फोटो खींचें—पीछे के तारे कैमरे में नहीं आएंगे।”  

अब सुनिए दुनिया के बेरोजगार वैज्ञानिको का एक और दावा की  “चाँद पर गुरुत्वाकर्षण (Gravity) कम है, तो अंतरिक्ष यात्री हनुमान जी की तरह लंबी छलांगें क्यों नहीं लगा रहे थे?” अब  इसके पीछे का विज्ञानं भी सुनिए : “सुनने में यह तर्क सही लगता है, लेकिन असलियत बहुत रिस्की थी। अंतरिक्ष यात्रियों ने अपनी पीठ पर PLSS (Life Support System) पहना था जो बहुत भारी और नाजुक था।

अगर वे बहुत ऊँचा कूदते और अपना संतुलन खो देते, तो सूट फटने का डर था। ऑक्सीजन खत्म हो सकती थी या सूट का प्रेशर लीक हो सकता था। इसीलिए उन्होंने ‘कंगारू हॉप’ को चुना, जो कम ग्रेविटी में चलने का सबसे सुरक्षित तरीका था।”

अब दुनिये के वो बड़े बड़े जासूसों को ये भी सुन्ना चाहिए की  सबसे बड़ा सबूत तो आज के आधुनिक ऑर्बिटर्स हैं। नासा के LRO (Lunar Reconnaissance Orbiter) और यहाँ तक कि भारत के चंद्रयान-2 के कैमरों ने भी उन जगहों की तस्वीरें ली हैं

जहाँ अपोलो के लैंडर आज भी खड़े हैं। वहाँ के धूल भरे मैदानों में अंतरिक्ष यात्रियों के चलने के रास्ते आज भी वैसे के वैसे ही हैं।”

“तो दोस्तों, मून लैंडिंग कोई शूटिंग नहीं, बल्कि मानव साहस और विज्ञान की सबसे बड़ी जीत थी। आपको क्या लगता है? क्या इंसान को फिर से चाँद पर जाना चाहिए? कमेंट्स में ज़रूर बताएं और ऐसी ही ‘फैक्ट चेकिंग’ वीडियो के लिए चैनल को सब्सक्राइब करें!”

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