वर्दी पर हमला और देश की सेना का अपमान, युवाओं को ‘क्रांति’ के नाम पर गालियां और हिंसा सिखा रहे सोनम वांगचुक? Sach Ki Raftar
जंतर-मंतर से अनशन समेटने के बाद अब गांव बैठकर सोनम वांगचुक नैतिकता और जिम्मेदारी की बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। जिस ‘जन-ज़ेड’ (Gen-Z) और युवा पीढ़ी की तारीफों के वे कसीदे पढ़ रहे हैं, उसकी असलियत देश ने जंतर-मंतर की सड़कों पर खुली आंखों से देखी है। क्या इसे ही सोनम वांगचुक ‘जिम्मेदारी और इज्जत’ कहते हैं?
गालियों और रीलबाज़ी का प्रदर्शन: क्या यही है युवा पीढ़ी का आदर्श?
जिस युवा पीढ़ी को सोनम ‘निस्वार्थ और अनुशासित’ बता रहे हैं, उसी भीड़ का बड़ा हिस्सा विरोध-प्रदर्शन के नाम पर केवल घटिया रीलबाज़ी और अभद्रता करने आया था। जंतर-मंतर का माहौल किसी गंभीर मुद्दे की जगह अश्लील और अमर्यादित भाषा का केंद्र बन चुका था।
मर्यादा की सारी हदें पार: विरोध के नाम पर ऐसी-ऐसी गंदी और भद्दी गालियों वाली तख्तियां लहराई जा रही थीं, जिनकी कल्पना भी एक सभ्य समाज में नहीं की जा सकती। विशेष रूप से यह देखना शर्मनाक था कि जिस भाषा का इस्तेमाल वहां सरेआम किया गया, उसे कोई भी सभ्य नागरिक अपने घर में सुनना भी पसंद नहीं करेगा।
सोनम वांगचुक से सीधा सवाल: क्या सोनम वांगचुक अपने बच्चों को भी यही ‘संस्कार’ और ‘भाषा’ सिखाते हैं? क्या वे चाहेंगे कि उनके अपने बच्चे भी ऐसी ही अश्लील तख्तियां लेकर सड़कों पर घूमें और इसे ‘क्रांति’ का नाम दें?
संवैधानिक पदों और सेना का अपमान: क्या यही है ‘इज्जत’?
सोनम वांगचुक अपने वीडियो में बड़ी सादगी से धन्यवाद दे रहे हैं, लेकिन वे उन हरकतों पर पूरी तरह खामोश हैं जो उनके समर्थन में आई भीड़ ने कीं:
संवैधानिक संस्थाओं को गालियां: देश के प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री, पुलिस प्रशासन और यहाँ तक कि हमारी बहादुर सेना को लेकर जिस तरह की घटिया और अमर्यादित शब्दावली का प्रयोग किया गया, क्या वह ‘सभ्य लोकतंत्र’ का हिस्सा है?
वर्दी पर हमला: अपने पिता की उम्र के पुलिस अधिकारियों के साथ धक्का-मुक्की करना, उनके सिर फोड़ना और उन पर पथराव करना—क्या सोनम वांगचुक की नजर में यही ‘जिम्मेदारी’ निभाना है?
‘धक्का देने’ की राजनीति और असलियत
सोनम वांगचुक कहते हैं कि वे हर आंदोलन या गाड़ी को ‘धक्का’ देने का काम करते हैं। लेकिन सच तो यह है कि यह ‘धक्का’ युवाओं को सही रास्ते पर ले जाने के बजाय उन्हें अराजकता, गाली-गलौज और हिंसा की आग में झोंकने का काम कर रहा है।
मीडिया और कंटेंट क्रिएटर्स का धन्यवाद करते हुए वे भूल गए कि उसी मीडिया के पत्रकारों के साथ जंतर-मंतर पर बदसलूकी की गई। डॉक्टरों और पुलिस का आभार जताते-जताते वे यह छुपा गए कि उन्हीं की बुलाई भीड़ ने ऑन-ड्यूटी सरकारी कर्मचारियों के साथ कितना अमानवीय व्यवहार किया।
अनशन तोड़कर गांव लौट जाना आसान है, लेकिन जंतर-मंतर पर युवाओं के नाम पर जो अभद्रता, गाली-गलौज और अराजकता फैलाई गई, उसकी जिम्मेदारी से सोनम वांगचुक मुंह नहीं मोड़ सकते। किसी भी आंदोलन में अगर भाषा की मर्यादा और व्यवस्था का सम्मान ही खत्म हो जाए, तो वह ‘लोकतंत्र का आंदोलन’ नहीं, बल्कि सिर्फ ‘अराजकता का प्रदर्शन’ बनकर रह जाता है।
