संसद में Sanjay Singh का झूठ बेनकाब! 😡 | AAP की देशभक्ति का उड़ा मज़ाक | Arvind Kejriwal Exposed! Sach Ki Raftar

संसद में Sanjay Singh का झूठ बेनकाब! 😡 | AAP की देशभक्ति का उड़ा मज़ाक | Arvind Kejriwal Exposed! Sach Ki Raftar

दोस्तों, संसद देश की नीतियाँ बनाने, जनता के मुद्दों पर बात करने और देश को दिशा देने की जगह है। लेकिन आम आदमी पार्टी और उनके नेताओं के लिए शायद संसद केवल एक ‘ड्रामा स्टेज’ बन चुकी है!

हाल ही में संसद में जब वंदे मातरम और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान पर चर्चा हो रही थी, तब आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने ऐसा भाषण दिया जिसे सुनकर देश का हर समझदार नागरिक हैरान रह गया। राष्ट्रीय गान, तिरंगे और ‘मातृभूमि की वंदना’ जैसे गंभीर विषयों पर बात करने के बजाय, संजय सिंह ने पुराने इतिहास का रोना रोया और मुद्दे को पूरी तरह भटकाने की कोशिश की।

आज हम संजय सिंह के इस भाषण के एक-एक पॉइंट की धज्जियाँ उधेड़ेंगे और देखेंगे कि कैसे आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की कथनी और करनी में आसमान-जमीन का फर्क है!”

“संजय सिंह जी, जब आपके पास आज के राष्ट्रहित के मुद्दों पर कोई जवाब नहीं होता, तो आप सीधा 52 साल पीछे चले जाते हैं! देश में वंदे मातरम और राष्ट्रीय ध्वज के अपमान को रोकने के लिए कड़े कानून की बात हो रही है, लेकिन आप 1930 और 1949 के पन्नों में उलझे हुए हैं।

संजय सिंह जी, आरएसएस और देश की राष्ट्रवादी जनता हर दिन अपने दिलों में भारत माता और तिरंगे के प्रति सम्मान रखती है। लेकिन आपकी पार्टी का क्या? जिस आम आदमी पार्टी ने खुद को ‘कट्टर देशभक्त’ कहकर प्रचारित किया, उसी पार्टी के नेता राष्ट्रीय सुरक्षा, सर्जिकल स्ट्राइक और सेना के पराक्रम पर सवाल उठाते नहीं थकते! क्या 52 साल पुराना राग अलापने से आपकी आज की ज़िम्मेदारियों से ध्यान हट जाएगा?”
संसद का वाकया: जब चेयर (अध्यक्ष) ने बिना इजाजत दस्तावेज पढ़ने से रोका, तो संजय सिंह चिल्लाने लगे— “मेरी बात दबा देंगे क्या? मेरा समय रोकिए साहब!”
“संसद के कुछ नियम और मर्यादाएँ होती हैं। अगर आप कोई चिट्ठी या दस्तावेज पढ़ना चाहते हैं, तो आपको सभापति की अनुमति (Permission) लेनी होती है। यह नियम हर सांसद के लिए बराबर है।
लेकिन आम आदमी पार्टी की पुरानी आदत है—नियम तोड़ो, और जब टोका जाए तो ‘विक्टिम कार्ड’ खेलो! संजय सिंह संसद में नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाते हैं और जब स्पीकर उन्हें टोकते हैं, तो रोना शुरू कर देते हैं कि ‘मेरी आवाज दबाई जा रही है’। संजय जी, संसद कोई सड़क का धरना नहीं है जहाँ आप बिना नियम के जो मन में आए बोलने लगें!”
संजय सिंह का दावा: “वंदे मातरम का मतलब मातृभूमि की वंदना है… मातृभूमि की वंदना तब होगी जब किसानों और मजदूरों का सम्मान होगा।”
“सुनने में यह भाषण बहुत लुभावना लगता है, लेकिन ज़रा ठहरिए! क्या यही बातें अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार पर लागू नहीं होतीं?
किसान और मजदूर: दिल्ली में DTC बस कर्मचारियों, अतिथि शिक्षकों (Guest Teachers) और सफाई कर्मचारियों को जब अपने हक के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा, तब केजरीवाल सरकार की ‘मातृभूमि भक्ति’ कहाँ गई थी?
शराब घोटाला और भ्रष्टाचार: क्या देश की मातृभूमि की सेवा का मतलब यह है कि जनता के पैसों पर डाका डाला जाए और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में जेल की हवा खाई जाए?
शीशमहल का सच: जो अरविंद केजरीवाल कभी आम आदमी की दुहाई देते थे, उन्होंने अपने बंगले (शीशमहल) के रेनोवेशन पर जनता के करोड़ों रुपये उड़ा दिए। क्या इसी को संजय सिंह ‘मातृभूमि के बेटों-बेटियों का सम्मान’ कहते हैं?”
“जब भी संसद में राष्ट्रवाद, वंदे मातरम या देश को मजबूत करने वाले कड़े कानूनों पर बिल लाया जाता है, तब आम आदमी पार्टी और उनके सहयोगियों के पेट में दर्द क्यों होने लगता है?
संजय सिंह पूरी बहस में यह साबित करने में लगे रहे कि विरोधी पक्ष ने अतीत में क्या गलत किया, लेकिन उन्होंने एक बार भी सीना ठोक कर यह नहीं कहा कि ‘हां, वंदे मातरम का अपमान करने वालों को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए!’ वे सिर्फ इधर-उधर की बातें करके मूल विषय को भटकाते रहे।”
“दोस्तों, भाषणों में लच्छेदार बातें करना बहुत आसान होता है, लेकिन धरातल पर ईमानदारी से काम करना मुश्किल। आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की राजनीति अब देश के सामने पूरी तरह नंगी हो चुकी है। राष्ट्रवाद का चोला पहनकर संसद में जाकर सिर्फ राजनीति करना और देश के सम्मान से जुड़े मुद्दों पर ध्यान भटकाना इनकी आदत बन चुकी है।
आप इस भाषण और आम आदमी पार्टी के इस दोहरे रवैये के बारे में क्या सोचते हैं? क्या संसद में संजय सिंह का यह आचरण सही था? अपनी राय नीचे कमेंट सेक्शन में ज़रूर बताएं। वीडियो को लाइक करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें!

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