सच्चाई बर्दाश्त नहीं? kejrwal का ‘तानाशाही’ चेहरा बेनकाब! Indra Gandh की राह पर AAP | Sach Ki Raftar

सच्चाई बर्दाश्त नहीं? kejrwal का ‘तानाशाही’ चेहरा बेनकाब! Indra Gandh की राह पर AAP | Sach Ki Raftar

आज हम भारत के लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय को फिर से ज़िंदा होते देख रहे हैं! आज, जिस ‘आम आदमी पार्टी’ ने हमें VIP कल्चर खत्म करने का सपना दिखाया था, वही पार्टी आज अखबारों की आवाज़ दबाने के लिए सत्ता का दुरुपयोग कर रही है!

जब सरकार से सवाल पूछा जाता है, जब नीतियां जनता के लिए नुकसानदेह साबित होती हैं, तो तानाशाह क्या करते हैं? वे कलम पर ताला लगाते हैं! और आज पंजाब में, अरविंद केजरीवाल की छाया तले, ठीक वही हो रहा है!

पंजाब की AAP सरकार पर ये आरोप लग रहे हैं कि वे स्थानीय अखबारों को विज्ञापन रोककर धमका रहे हैं! क्यों? क्योंकि उन्होंने सरकार की नीतियों की आलोचना की! अरविन्द केजरीवला के चंडीगढ़ बंगले के बारे में छापा और है केजरीवाल से बर्दाश नहीं हुआ, यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खुला हमला है! यह लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी तोड़ने की कोशिश है!

याद कीजिए इतिहास! जब इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा था, तो सबसे पहले किस पर चोट की थी? मीडिया पर! प्रेस की आज़ादी को कुचला गया था! सेंसरशिप लगी थी! आज, उसी तानाशाही सोच की झलक हमें अरविंद केजरीवाल की पार्टी में दिख रही है!

क्या केजरीवाल भी यह मान चुके हैं कि वे गलत हैं? क्या पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान इतने कमजोर पड़ गए हैं कि वे आलोचना को सहन नहीं कर सकते? विज्ञापन की आड़ में खबरों को खरीदना या दबाना, यह सत्ता का सबसे घिनौना दुरुपयोग है!

हम पूछना चाहते हैं केजरीवाल से! जब आपने खुद को ‘क्रांतिकारी’ बताया था, तो क्या आपका मतलब सिर्फ सरकार बनने तक था? क्या आपकी ‘सच्चाई’ सिर्फ तब तक थी जब तक आप विपक्ष में थे? अब सत्ता में आते ही, सच्चाई को छिपाने के लिए विज्ञापन की रस्सी से मीडिया का गला घोंट रहे हैं? यह पाखंड है! यह ढोंग है!

सरकार कहती है कि विज्ञापन नीति ‘पारदर्शी’ है! पारदर्शी? जब कोई अखबार आलोचना करता है, तो उसका विज्ञापन बंद हो जाता है? जब कोई अखबार सरकार की तारीफ करता है, तो उसे सरकारी विज्ञापन की बरसात होती है? यह पारदर्शिता नहीं, यह ब्लैकमेलिंग है! आज जो अखबार आम आदमी पार्टी की विफलताओं को छाप रहे हैं, उन्हें डिस्ट्रिब्यूशन रोकने की धमकी मिल रही है! यह कोई ‘नियमों का पालन’ नहीं है, यह ‘डर का राज’ स्थापित करने की साज़िश है!

यह सवाल सिर्फ पंजाब का नहीं है! यह सवाल पूरे देश के लोकतंत्र का है! अगर आज अखबारों को सरकार की आलोचना करने पर रोका जाएगा, तो कल जनता सच्चाई सुनेगी किससे? क्या आप देश को उस दौर में वापस ले जाना चाहते हैं जहाँ सरकार का विरोध करना देशद्रोह माना जाता था?

आपका क्या मानना है? क्या यह सच में केजरीवाल का मिनी-इमरजेंसी है? कमेंट करके अपना गुस्सा और राय जाहिर करें! इस वीडियो को हर उस भारतीय तक शेयर करें जो आज भी आज़ादी की कीमत जानता है!  और हाँ, ऐसी सच्ची खबरों, जो सत्ता को आईना दिखाती हैं, उनके लिए चैनल को तुरंत सब्सक्राइब करें!

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