22000 Crore कर्ज माफ सिर्फ 6.5 करोड़ में कैसे? Subhash Chandra केस की असली कहानी क्या? Sach Ki Raftar
गरीब लहरों पर पहरे बिठाए जाते हैं… समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता! बरेलवी साहब का यह शेर सिर्फ शायरी नहीं है दोस्तों… यह हमारे देश की बैंकिंग और कानूनी व्यवस्था की वो नंगी सच्चाई है, जो आज आपके और हमारे मुंह पर करारा थप्पड़ मारती है!
एक तरफ आप हैं… अगर आपकी एक महीने की बाइक या कार की EMI छूट जाए, तो रिकवरी एजेंट आपके घर के बाहर खड़े होकर आपकी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ा देते हैं!
और दूसरी तरफ… ₹2,000 करोड़ से ज़्यादा का कर्ज़ दबाकर बैठे ‘बड़े साहब’!
जानते हैं उनका हिसाब कैसे चुकता होता है? मात्र ₹6.5 करोड़ देकर!
जी हां! सही सुना आपने! 99.97% रकम साफ़… माफ… खत्म!
आज बात होगी उस खेल की, जिसे कानून की भाषा में ‘हेयरकट’ कहते हैं, लेकिन असल में यह आम जनता की गाढ़ी कमाई पर चलाए जाने वाला ‘उस्तरा’ है! मामला समझिए। ज़ी ग्रुप (Zee Group) के संस्थापक, एस्सेल ग्रुप (Essel Group) के मालिक और पूर्व राज्यसभा सांसद — सुभाष चंद्रा!
कंपनी ने हज़ारों करोड़ का लोन लिया। सुभाष चंद्रा ने दी थी अपनी ‘पर्सनल गारंटी’… यानी अगर कंपनी डूबी, तो साहब अपनी जेब से पैसा चुकाएंगे!
कंपनी डूब गई, बैंकों का पैसा अटक गया। 2022 में ‘इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस’ मामला खींचकर NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) ले गई।
अप्रैल 2024 में सुभाष चंद्रा को पर्सनली इंसॉल्वेंसी (दिवाला प्रक्रिया) में डाला गया। सबकी नज़रें टिकी थीं कि बैंकों की पाई-पाई वसूल होगी।
लेकिन फिर आता है क्लाइमेक्स… एक ‘सेटलमेंट प्लान’!
कहा जाता है— *”साहब के पास तो पैसा ही नहीं है! 2,000 करोड़ छोड़ो, 6.5 करोड़ लो और मामला रफा-दफा करो! और सबसे हैरानी की बात? ट्रिब्यूनल ने इस सेटलमेंट पर मुहर भी लगा दी!
अब आप सोचेंगे क्या सरकार ने पैसा माफ किया? कानूनी जवाब है— नहीं, यह IBC (Insolvency and Bankruptcy Code) की प्रक्रिया है। लेकिन ज़रा उन बैंकों से पूछिए जिन्होंने जनता का पैसा उठाकर लोन में बांटा था!
- HDFC बैंक को क्या मिला? कुल बकाए का सिर्फ 3.2%!
- LIC Housing Finance का ₹1,322 करोड़ फंसा था… और बदले में उन्हें क्या मिला? सिर्फ 38 लाख रुपये!
HDFC बैंक अब इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी कर रहा है। LIC, कैनरा बैंक, एक्सिस बैंक, यूनियन बैंक— सब चिल्ला रहे हैं कि भाई, जांच करो! फॉरेंसिक ऑडिट करो! क्योंकि एक जादू हुआ है दोस्तों!
- 2017 में सुभाष चंद्रा की नेटवर्थ बताई गई थी — ₹45,888 करोड़!
- 2018 में बताई गई — ₹40,562 करोड़!
- और आज घोषित नेटवर्थ कितनी है? — **सिर्फ ₹31.79 करोड़!
हज़ारों करोड़ की संपत्ति आखिर गई कहां? क्या ज़मीन निगल गई या आसमान खा गया? लेनदारों ने आरोप लगाया कि संपत्ति छिपाई गई है, फॉरेंसिक जांच कराओ! लेकिन NCLT ने कहा— *”इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।” और इस पूरे ड्रामे पर जले पर नमक छिड़कने कौन आया? **लंदन में बैठे विजय माल्या!
माल्या ने बाकायदा बधाई दी और तंज कसा— *”भाई, मुझसे तो मूलधन से भी ज़्यादा वसूल कर लिया, और यहाँ 99.97% की छूट बाँटी जा रही है!” सोचिए! देश का सबसे बड़ा भगोड़ा हमारी व्यवस्था पर हंस रहा है!
अब सवाल यह नहीं है कि सुभाष चंद्रा ने पैसा क्यों नहीं दिया…
असली सवाल उन बैंकों और अफ़सरों से है जिन्होंने ₹2,000 करोड़ का लोन बांट दिया!**
- किस आधार पर यह लोन दिया गया?
- गारंटी लेते वक्त संपत्ति की जांच क्यों नहीं की गई?
- क्या बैंक अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी? या आम जनता के टैक्स के पैसे से इस घाटे को ‘राइट-ऑफ’ (Write-off) करके भूल जाया जाएगा?
बिजनेस में घाटा हो सकता है, रिस्क होता है… हम मानते हैं। कानून इसीलिए बना है ताकि कंपनियां दोबारा खड़ी हो सकें।
लेकिन जब कानून की ढाल सिर्फ ‘समंदर’ जैसे बड़े उद्योगपतियों को राहत दे और ‘लहरों’ जैसे आम इंसान को पिसने के लिए छोड़ दे… तब लोकतंत्र पर सवाल उठते हैं!
गरीब किसान की ज़मीन नीलाम हो जाती है, मिडिल क्लास के घर के बाहर ढोल बजा दिए जाते हैं… लेकिन 2,000 करोड़ के कर्ज़दार को ‘कमर्शियल विज़डम’ का हवाला देकर 6.5 करोड़ में एनओसी (NOC) दे दी जाती है!
आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? क्या आपको लगता है कि बड़े कर्ज़दारों के लिए नियम अलग और आम आदमी के लिए अलग हैं?
अपनी राय कमेंट बॉक्स में लिखकर पूरे गुस्से के साथ दर्ज कराइए!** अगर यह वीडियो आंखें खोलने वाली लगी हो, तो इसे हर उस दोस्त के साथ शेयर कीजिए जो हर महीने अपनी EMI ईमानदारी से भरता है।
