Akhilesh Yadav मुस्लिम महिलाओं के लिए Reservation अपनी राजनीती बचाने के लिए चाहते है? | Sach Ki Raftar
“क्या अखिलेश यादव को महिला सशक्तिकरण से कोई मतलब है, या उनकी नज़र सिर्फ और सिर्फ 2027 की ‘वोट बैंक’ की कुर्सी पर है? संसद में महिला आरक्षण पर छिड़ी बहस में अचानक ‘मुस्लिम कोटा’ का राग अलापना… क्या ये तुष्टीकरण की वही पुरानी फिल्म है जिसे मुलायम सिंह यादव ने 2000 में चलाया था?” नमस्कार दोस्तों!। आज बात होगी उस राजनीतिक पैंतरेबाजी की, जिसे ‘कोटा विद इन कोटा’ (Quota within Quota) कहा जा रहा है। अखिलेश यादव कह रहे हैं कि महिलाओं को आरक्षण दो, लेकिन उसमें मुस्लिम महिलाओं को अलग से हिस्सा दो।
सुनने में ये ‘आधी आबादी’ का हक लगता है, लेकिन इसकी गहराई में उतरेंगे तो आपको वही पुरानी ‘तुष्टीकरण’ की बू आएगी। वही लाइन, जिस पर कभी मुलायम सिंह यादव चले थे अटल जी के बिल का विरोध करो क्योंकि उसमें मुस्लिम कोटा नहीं है’। आज अखिलेश भी उसी रास्ते पर हैं। सदन में जब अखिलेश ने सवाल उठाया, तो गृह मंत्री अमित शाह ने जो जवाब दिया, उसने पूरी तस्वीर साफ कर दी। शाह ने सीधा कहा हमारा संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की इजाज़त नहीं देता!
बिल्कुल सही बात! जब संविधान में साफ लिखा है कि आरक्षण जाति और पिछड़ेपन के आधार पर होगा, धर्म के आधार पर नहीं… तो अखिलेश जी ये ‘गैर-संवैधानिक’ मांग क्यों कर रहे हैं? क्या उन्हें नहीं पता कि इस्लाम में तो जाति व्यवस्था ही नहीं मानी जाती? तो फिर ये कोटा किस आधार पर? असल खेल समझिए दोस्तों! ये मुद्दा महिला अधिकार का है ही नहीं, ये मुद्दा है ‘वोटों की सेंधमारी’ का। अखिलेश देख रहे हैं कि बिहार और महाराष्ट्र में मुस्लिम वोटर असदुद्दीन ओवैसी की तरफ भाग रहा है। यूपी में कांग्रेस भी तुष्टीकरण की रेस में खड़ी है।
अखिलेश यादव को डर है कि कहीं उनका सबसे मजबूत वोट बैंक खिसक न जाए। इसलिए, वो कांग्रेस से भी एक कदम आगे निकलकर ‘मुस्लिम आरक्षण’ का झंडा बुलंद कर रहे हैं। उन्हें पता है कि दूसरे राज्यों में उनकी पार्टी है नहीं, तो वहां नुकसान होने का डर नहीं। बस यूपी में 2027 की गोटी सेट होनी चाहिए! अमित शाह ने तो यहां तक कह दिया— “अगर आपको इतनी ही फिक्र है, तो अपनी पार्टी की सारी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को दे दीजिए, हमें कोई आपत्ति नहीं है!”
लेकिन नहीं, अखिलेश जी को टिकट नहीं देना, उन्हें तो बस संविधान की दीवारों से टकराने वाली मांग करनी है ताकि जनता के बीच ‘मसीहा’ बन सकें। 33% महिला आरक्षण में क्या मुस्लिम महिलाएं चुनाव नहीं लड़ सकतीं? बिल्कुल लड़ सकती हैं! उन पर कोई रोक नहीं है। फिर ये ‘मुस्लिम महिला’ का जाप सिर्फ और सिर्फ समाज को बांटने और एक विशेष वर्ग को खुश करने की राजनीति नहीं तो और क्या है? अंत में सवाल यही है— क्या देश का विकास संवैधानिक तरीके से होगा, या फिर सिर्फ कुछ चेहरों को खुश करने के लिए संविधान के साथ छेड़छाड़ की जाएगी?
क्या महिला आरक्षण को भी मजहब की बेड़ियों में जकड़ना सही है? आपकी क्या राय है? क्या अखिलेश यादव का ये कदम जायज है या ये सिर्फ चुनाव जीतने का एक घटिया हथकंडा है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर दें! अगर आपको हमारा कंटेंट पसंद आया, तो इस वीडियो को शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। जय हिंद!
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