Satluj पर Digital Surgical, सच से इतना खौफ क्यों? Diljeet Dosanjh | Sach Ki Raftar

Satluj पर Digital Surgical, सच से इतना खौफ क्यों? Diljeet Dosanjh | Sach Ki Raftar

कहने को तो लोकतंत्र चीन में भी है, कहने को तो लोकतंत्र दुनिया के तमाम तानाशाह मुल्कों में भी है! लेकिन लोकतंत्र की असली पहचान क्या है? अभिव्यक्ति की आजादी… सवाल पूछने की आजादी… और अपने अतीत के कड़वे सच को पर्दे पर देखने की आजादी! लेकिन आज भारत के लोकतंत्र में एक ऐसा अघोषित आपातकाल दस्तक दे चुका है, जहाँ सच दिखाने पर पूरी की पूरी फिल्म को ही डिजिटल प्लेटफॉर्म से गायब कर दिया जाता है।

दिलजीत दोसांझ की मच-अवेटेड फिल्म ‘सतलुज’ (जिसका असली नाम ‘पंजाब 95’ था) ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 पर रिलीज होती है, और महज 3 दिन के भीतर सरकार के एक अदृश्य डंडे के चलते उसे आनन-फानन में हटवा दिया जाता है! आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या था जिससे सत्ता के गलियारे कांप उठे? आखिर जसवंत सिंह खालरा के उस सच से सरकार को इतना खौफ क्यों है? आज इस वीडियो में करेंगे इस अघोषित सेंसरशिप का पूरा पर्दाफाश!

यह कोई सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं है, यह सीधे तौर पर इतिहास को दफन करने की एक सोची-समझी साजिश है। निर्देशक हनी त्रेहान की यह फिल्म पिछले 3 सालों से सेंसर बोर्ड (CBFC) के दफ्तरों में धूल फांक रही थी। कानूनी लड़ाइयों और 127 से ज्यादा कट्स के बाद, जब मेकर्स थक गए, तो उन्होंने बिना किसी बड़े तमाशे के इसे चुपचाप Zee5 पर ‘सतलुज’ नाम से रिलीज कर दिया।

सेंसर बोर्ड ने इसे हरी झंडी दी थी, यानी कानूनी तौर पर फिल्म में कुछ भी गलत नहीं था। लेकिन रिलीज के ठीक 3 दिन बाद Zee5 का एक आधिकारिक बयान आता है—”अगली सूचना तक यह फिल्म भारत में अनुपलब्ध (Unavailable) है।” और मजेदार बात देखिए, Zee5 कहता है कि वो मेकर्स की सोच के साथ खड़ा है… अरे भाई! अगर खड़े हो, तो फिर घुटने क्यों टेक दिए? किसके दबाव में आकर रातों-रात फिल्म को डिलीट करना पड़ा?

आखिर जसवंत सिंह खालरा कौन थे, जिनका नाम सुनते ही आज भी सिस्टम के हाथ-पांव फूल जाते हैं? 1984 के काले दौर के बाद, पंजाब में उग्रवाद को कुचलने के नाम पर सुरक्षा बलों को असीमित शक्तियां दे दी गई थीं। उस दौर में हजारों बेकसूर नौजवान घरों से उठाए गए और कभी लौटकर नहीं आए। एक बैंक डायरेक्टर की नौकरी छोड़कर जसवंत सिंह खालरा ने वो खतरनाक बीड़ा उठाया, जिसे छूने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता था।

उन्होंने पंजाब के श्मशान घाटों और नगर निगमों के गुप्त दस्तावेजों को खंगाला। अकेले अमृतसर के श्मशान घाटों से उन्होंने 6,107 अज्ञात शवों के पुख्ता सबूत दुनिया के सामने रखे, जिन्हें पुलिस ने लावारिस बताकर गुपचुप तरीके से जला दिया था। खालरा का अनुमान था कि पूरे पंजाब में ऐसे 25,000 से ज्यादा युवाओं को गैर-कानूनी तरीके से मौत के घाट उतारा गया। और यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है! भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने ‘पृथ्वीपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य’ के ऐतिहासिक फैसले में खालरा की इस खोज को बिल्कुल सच माना था। लेकिन इस सच को उजागर करने की कीमत खालरा साहब को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। सितंबर 1995 में उनके घर के बाहर से उनका अपहरण हुआ और बाद में सीबीआई जांच में खुद पुलिस अधिकारी ही उनकी हत्या के दोषी पाए गए।

अब सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल! इस देश में ‘द कश्मीर फाइल्स’ धड़ल्ले से चलती है, ‘द केरला स्टोरी’ को टैक्स फ्री किया जाता है, ‘द बंगाल फाइल्स’ को हरी झंडी मिलती है… तब सरकार के सूत्रों को यह फिक्र नहीं होती कि मुल्क का माहौल खराब हो जाएगा? तब नेशनल सिक्योरिटी खतरे में नहीं आती? लेकिन जब पंजाब के एक कड़वे सच पर, एक ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट पर दिलजीत दोसांझ फिल्म लेकर आते हैं, तो अचानक सरकारी सूत्रों के हवाले से खबर आती है कि—”इस फिल्म का इस्तेमाल एंटी-इंडिया ताकतें (Anti-India forces) कर सकती हैं, इससे देश की सुरक्षा को खतरा है।”

क्या देश की सुरक्षा इतनी कमजोर है कि एक फिल्म से खतरे में आ जाएगी? या असल में खतरा उन चेहरों के बेनकाब होने का है, जो इस दमन के पीछे थे? अगर उस दौर के गुनाहों के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार या कोई भी राजनीतिक व्यवस्था दोषी थी, तो देश की जनता को वो सच जानने का हक क्यों नहीं है?

सरकार ने फिल्म तो हटा दी, लेकिन सोशल मीडिया पर एक ऐसा बवंडर शुरू हो गया है जिसे रोकना अब मुमकिन नहीं है। दिलजीत दोसांझ ने साफ शब्दों में ललकारते हुए लिखा कि “खालरा साहब की आवाज को कोई नहीं दबा सकता।” शिरोमणि अकाली दल के सुखबीर सिंह बादल ने इसे सामूहिक यादों और अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला बताया है। यहाँ तक कि राज्यसभा सांसद हरभजन सिंह ने भी इस दमन पर गहरी संवेदना जताई थी। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब सेंसरशिप की कैंची ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का भी गला घोंटने लगी है?

जब भी इस देश में जनता को सच से दूर रखने की कोशिश की जाएगी, तब-तब इतिहास खुद को दोहराएगा। स्क्रीन पर कैंची चलाई जा सकती है, ऐप्स से फिल्में डिलीट की जा सकती हैं, लेकिन जो सच सुप्रीम कोर्ट के पन्नों में दर्ज है और जो पंजाब के लोगों के दिलों में महफूज है, उसे कोई सरकार कभी मिटा नहीं सकती। जब डिजिटल दुनिया पर पाबंदियां थोपी जाने लगें, तो शायद अब वक्त आ गया है कि हम वापस किताबों की तरफ लौटें और अपने इतिहास को खुद पढ़ें।

इस पूरी अघोषित पाबंदी पर आपकी क्या राय है? क्या ‘सतलुज’ फिल्म को रोकना सही है या यह सीधे तौर पर तानाशाही है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें। वीडियो को शेयर करें ताकि यह सच हर किसी तक पहुंचे। चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। धन्यवाद!

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