TMC में महाविस्फोट! 60 विधायक अलग हुए तो खत्म हो जाएगा Mamata Banerjee का खेला! | Sach Ki Raftar
क्या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का ‘खेला’ अब उनके ऊपर ही भारी पड़ गया है? क्या कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग में ठीक वैसी ही पटकथा लिखी जा रही है, जैसी मुंबई के मंत्रालय में शिवसेना को तोड़ने के लिए लिखी गई थी? जी हां, बिल्कुल सही सुना आपने! जो दीदी पूरे देश में बीजेपी को पटखनी देने का दावा करती थीं, आज खुद उनकी कुर्सी के पैर डगमगा रहे हैं। टीएमसी के अंदर एक ऐसा ज्वालामुखी थमा हुआ था, जो अब अचानक फट चुका है।
क्या ममता बनर्जी की पार्टी आज ही दो फाड़ हो जाएगी? और क्या बीजेपी ने चुपचाप दीदी के ही गढ़ में सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है? बात सिर्फ अफवाहों की नहीं है, बात आंकड़ों और इरादों की है। टीएमसी से निकाले गए दो विधायकों—ऋतुव्रत बनर्जी और संदीपन साह—ने वो बिगुल फूंक दिया है जिसने ममता कैंप की नींद उड़ा दी है।
ऋतुव्रत बनर्जी का दावा छोटा-मोटा नहीं है, उनका सीधा दावा है कि टीएमसी के करीब 50 से 60 विधायक उनके संपर्क में हैं! और वो सिर्फ पार्टी नहीं छोड़ रहे, बल्कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने की तैयारी कर चुके हैं।
सूत्रों की मानें तो यह बागी गुट सीधे विधानसभा स्पीकर को चिट्ठी सौंपने जा रहा है, जिसमें दावा किया जाएगा कि “असली टीएमसी ममता बनर्जी की नहीं, बल्कि हमारी है!” यानी जो तानाशाही पार्टी के अंदर चल रही थी, उसे अब इन विधायकों ने उखाड़ फेंकने का मन बना लिया है।
अब सवाल उठता है कि ये चिंगारी भड़की कहां से? तो आपको बता दें कि दीदी की आंखों के ठीक नीचे, विधानसभा के अंदर ही सारा गेम सेट हो गया था। ऋतुव्रत और संदीपन साह को पार्टी से निकालने से ठीक पहले, दोनों नेताओं ने विधानसभा स्पीकर के कमरे में बीजेपी नेताओं और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ आधे घंटे तक गुप्त मीटिंग की थी! इस मीटिंग के बाद कोलकाता के मशहूर गेटवे होटल में एक और ‘सीक्रेट पॉलिटिकल डिनर’ हुआ।
खुद टीएमसी के प्रवक्ता कुणाल घोष ने इस मीटिंग का खुलासा करके अपनी ही पार्टी में हड़कंप मचा दिया। दीदी के सिपहसालार चाहे कैमरे पर आकर कितना भी कहें कि ‘सब ठीक है’, लेकिन विधानसभा पहुंच रहे विधायकों की बढ़ती संख्या गवाही दे रही है कि दीदी का किला अब ढहने की कगार पर है। आइए अब आपको समझाते हैं इस बगावत का पूरा गणित, जिसके सामने ममता बनर्जी लाचार नजर आ रही हैं। भारत के दलबदल विरोधी कानून के मुताबिक, अगर आपको पार्टी तोड़नी है और अपनी विधायकी भी बचानी है,
तो कुल विधायकों के दो-तिहाई हिस्से की जरूरत होती है। वर्तमान में टीएमसी के पास कुल 80 विधायक हैं। इसका मतलब है कि बागी गुट को कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए कम से कम 54 विधायकों की जरूरत पड़ेगी। और बागी नेताओं का दावा क्या है? 60 विधायक! यानी जरूरत से कहीं ज्यादा। अगर यह दावा आज सच साबित हो जाता है, तो ममता बनर्जी की पार्टी कानूनी रूप से दो टुकड़ों में बंट जाएगी और दीदी सिर्फ देखती रह जाएंगी।
यह बगावत दिखाती है कि टीएमसी के अंदर लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं बची थी। जो पार्टी सिर्फ एक परिवार और भतीजे के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई हो, वहां जमीन से जुड़े विधायकों का दम घुटना लाजिमी था। आज जो विधायक बागी हुए हैं, वो ममता बनर्जी की इसी तानाशाही और अहंकार की राजनीति का नतीजा हैं। पश्चिम बंगाल की जनता भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज और हिंसा से त्रस्त थी ही, अब टीएमसी के अपने नेता भी इस घुटन से बाहर निकलना चाहते हैं।
बीजेपी ने यहां कोई खेल नहीं किया, बल्कि ममता बनर्जी के अपने ही कर्म और उनके अपनों का असंतोष आज उन्हें इस मोड़ पर ले आया है। अब देखना यह होगा कि क्या आज बंगाल में ‘ठाकरे ब्रांड राजनीति’ का अंत होगा और एक नया इतिहास लिखा जाएगा? क्या ममता बनर्जी आखिरी वक्त पर कोई नया पैंतरा चलकर अपनी डूबती नैया को बचा पाएंगी, या फिर शुभेंदु अधिकारी का मास्टरस्ट्रोक दीदी के राजनीतिक वजूद को हिलाकर रख देगा?
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